गृध्रसी= साइटिका का सफल इलाज
लक्षण - एक पैर मे पंजे से लेकर कमर तक दर्द होना गृध्रसी या रिंगण बाय कहलाता है। प्रायः पैर के पंजे से लेकर कूल्हे तक दर्द होता है जो लगातार होता रहता है। मुख्य लक्षण यह है कि दर्द केवल एक पैर मे होता है। दर्द इतना अधिक होता है कि रोगी सो भी नहीं पाता।
चिकित्सा - ये चिकित्सा मैंने बार बार अनुभव की है। बहुत अधिक परेशानी मे मे भी 3 दिन मे फायदा हो जाता है स्थायी लाभ के लिए 10-15 दिन जरूर प्रयोग करें। कई बार ये दवाई बाद मे बेअसर हो जाती है। एसी स्थिति मे पत्तों की मात्रा बढ़ा दे।
जो प्रतिदिन पत्ते नहीं ला सकते वह होमोयोपैथी की दुकान से Nyctanthes arbor-tristis का मदर टिंक्चर ले आए। 10 बूंद आधा कप पानी मे मिलाकर दिन मे 2 बार ले। जब असर कम हो जाए तो मात्रा बढ़ा दे ।
साथ मे यह दवाई भी ले- विषतिन्दुक वटी (स्वामी रामदेव की दुकान से) 2 गोली रात को सोते समय हल्के गरम दूध से ।
अधिक परेशानी होने पर 1 चने के बराबर "महावात विध्वंसन रस " हल्के गरम पानी से ले।
हमदर्द कंपनी का माजून चोपचीनी व माजून सुरंजन भी लाभ करता है। 1 चम्मच गरम पानी से।
हारसिंगार = पारिजात
के 10-15 कोमल पत्ते को कटे फटे न हों तोड़ लाएँ। पत्ते को धो कर मिक्सी मे या कैसे ही थोड़ा सा कूट ले या पीस ले। बहुत अधिक बारीक पीसने कि जरूरत नहीं है। लगभग 200-300 ग्राम पानी (2 कप) मे धीमी आंच पर उबालें। तेज आग पर मत पकाए। चाय की तरह पकाए। चाय कि तरह छान कर गरम गरम पानी (काढ़ा) पी ले। पहली बार मे ही 10% फायदा होगा। प्रतिदिन 2 बार पिए । यदि आप ऑफिस जाते हैं तो दोगुना पानी उबाले। थर्मस मे भरकर ले जाएँ। इस हरसिंगार के पत्तों के काढ़े से 15 मिनट पहले और 1 घंटा बाद तक ठंडा पानी न पीए। दही लस्सी और आचार न खाएं। बार बार प्रयोग किया है । कभी असफल नहीं हुआ।
पारिजात (Nyctanthes arbor-tristis) एक पुष्प देने वाला वृक्ष है। इसे परिजात, हरसिंगार, शेफाली, शिउली आदि नामो से भी जाना जाता है। इसका वृक्ष 10 से 15 फीट ऊँचा होता है। इसका वानस्पतिक नाम 'निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस' है। पारिजात पर सुन्दर व सुगन्धित फूल लगते हैं।यह सब स्थानो पर मिलता है। इसकी सबसे बड़ी पहचान है सफ़ेद फूल केसरिया डंडी। सुबह सब फूल झड जाते है ।
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जोड़ों के दर्द, घुटनो के दर्द, कंधे की जकड़न, एक टांग मे दर्द (साइटिका/रिंगन बाय/ गृध्रसी), गर्दन का दर्द (सरवाईकाल स्पोंदिलाइटिस) आदि की हानि रहित सुरक्षित चिकित्सा।
ये चिकित्सा आयुर्वेद विशेषज्ञ “श्री श्याम सुंदर” जी ने अपनी पुस्तक रसायनसार मे लिखी हैं। मैं इस तेल को पिछले 5 सालों से बना रहा हूँ और प्रयोग कर रहा हूँ। कोई भी आयुर्वेदिक तेल जैसे महानारायण तेल, आयोडेक्स, मूव, वोलीनी आदि इसके समान प्रभावशाली नहीं है। एक बार आप इसे जरूर बनाए।
सामान – कायफल =250 ग्राम , तेल (सरसों या तिल का)=500 ग्राम
कायफल- “यह एक पेड़ की छाल है” जो देखने मे गहरे लाल रंग की खुरदरी लगभग 2 इंच के टुकड़ों मे मिलती है। ये सभी आयुर्वेदिक जड़ी बूटी बेचने वाली दुकानों पर कायफल के नाम से मिलती है। इसे लाकर कूट कर बारीक पीस लेना चाहिए। जितना महीन/ बारीक पीसोगे उतना ही अधिक गुणकारी होगा।
बनाने की विधि – एक लोहे/ पीतल/ एल्यूमिनियम की कड़ाही मे तेल गरम करें। जब तेल गरम हो जाए तब थोड़ा थोड़ा करके कायफल का चूर्ण डालते जाएँ। आग धीमी रखें। जब सारा चूर्ण खत्म हो जाए तब कड़ाही के नीचे से आग बंद कर दे। एक कपड़े मे से तेल छान ले। जब तेल ठंडा हो जाए तब कपड़े को निचोड़ लें। इस तेल को एक बोतल मे रख ले। कुछ दिन मे तेल मे से लाल रंग नीचे बैठ जाएगा। उसके बाद उसे दूसरी शीशी मे डाल ले। अधिक गुणकारी बनाने के लिए इस साफ तेल मे 25 ग्राम दालचीनी का मोटा चूर्ण डाल दे। जो कायफल का चूर्ण तेल छानने के बाद बच जाए उसी को हल्का गरम करके उसी से सेके। उसे फेकने की जरूरत नहीं। हर रोज उसी से सेके।
जहां पर भी दर्द हो इसे हल्का गरम करके धीरे धीरे मालिश करें। मालिश करते समय हाथ का दबाव कम रखें। उसके बाद सेक जरूर करे। बिना सेक के लाभ कम होता है।
मालिस करने से पहले पानी पी ले। मालिश और सेक के 2 घंटे बाद तक ठंडा पानी न पिए। प्यास लगे तो गरम दूध पिए।

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