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Saturday, 14 February 2015

तुलसी















तुलसी

तुलसी की २१ से ३५ पत्तियाँ स्वच्छ खरल या सिलबट्टे (जिस पर मसाला न पीसा गया हो) पर चटनी की भांति पीस लें और १० से ३० ग्राम मीठी दही में मिलाकर नित्य प्रातः खाली पेट तीन मास तक खायें। ध्यान रहे दही खट्टा न हो और यदि दही माफिक न आये तो एक-दो चम्मच शहद मिलाकर लें। छोटे बच्चों को आधा ग्राम दवा शहद में मिलाकर दें। दूध के साथ भुलकर भी न दें। औषधि प्रातः खाली पेट लें। आधा एक घंटे पश्चात नाश्ता ले सकते हैं। दवा दिनभर में एक बार ही लें परन्तु कैंसर जैसे असह्य दर्द और कष्टप्रद रोगो में २-३ बार भी ले सकते हैं।

इसके तीन महीने तक सेवन करने से खांसी, सर्दी, ताजा जुकाम या जुकाम की प्रवृत्ति, जन्मजात जुकाम, श्वास रोग, स्मरण शक्ति का अभाव, पुराना से पुराना सिरदर्द, नेत्र-पीड़ा, उच्च अथवा निम्न रक्तचाप, ह्रदय रोग, शरीर का मोटापा, अम्लता, पेचिश, मन्दाग्नि, कब्ज, गैस, गुर्दे का ठीक से काम न करना, गुर्दे की पथरी तथा अन्य बीमारियां, गठिया का दर्द, वृद्धावस्था की कमजोरी, विटामिन ए और सी की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग, सफेद दाग, कुष्ठ तथा चर्म रोग, शरीर की झुर्रियां, पुरानी बिवाइयां, महिलाओं की बहुत सारी बीमारियां, बुखार, खसरा आदि रोग दूर होते हैं।

यह प्रयोग कैंसर में भी बहुत लाभप्रद है।

Thursday, 5 February 2015

तुलसी
















तुलसी

तुलसी में गजब की रोगनाशक शक्ति है। विशेषकर सर्दी, खांसी व बुखार में यह अचूक दवा का काम करती है। इसीलिए भारतीय आयुर्वेद के सबसे प्रमुख ग्रंथ चरक संहिता में कहा गया है।

- तुलसी हिचकी, खांसी,जहर का प्रभाव व पसली का दर्द मिटाने वाली है। इससे पित्त की वृद्धि और दूषित वायु खत्म होती है। यह दूर्गंध भी दूर करती है।

- तुलसी कड़वे व तीखे स्वाद वाली दिल के लिए लाभकारी, त्वचा रोगों में फायदेमंद, पाचन शक्ति बढ़ाने वाली और मूत्र से संबंधित बीमारियों को मिटाने वाली है। यह कफ और वात से संबंधित बीमारियों को भी ठीक करती है।

- तुलसी कड़वे व तीखे स्वाद वाली कफ, खांसी, हिचकी, उल्टी, कृमि, दुर्गंध, हर तरह के दर्द, कोढ़ और आंखों की बीमारी में लाभकारी है। तुलसी को भगवान के प्रसाद में रखकर ग्रहण करने की भी परंपरा है, ताकि यह अपने प्राकृतिक स्वरूप में ही शरीर के अंदर पहुंचे और शरीर में किसी तरह की आंतरिक समस्या पैदा हो रही हो तो उसे खत्म कर दे। शरीर में किसी भी तरह के दूषित तत्व के एकत्र हो जाने पर तुलसी सबसे बेहतरीन दवा के रूप में काम करती है। सबसे बड़ा फायदा ये कि इसे खाने से कोई रिएक्शन नहीं होता है।

तुलसी की मुख्य जातियां- तुलसी की मुख्यत: दो प्रजातियां अधिकांश घरों में लगाई जाती हैं। इन्हें रामा और श्यामा कहा जाता है।

- रामा के पत्तों का रंग हल्का होता है। इसलिए इसे गौरी कहा जाता है।

- श्यामा तुलसी के पत्तों का रंग काला होता है। इसमें कफनाशक गुण होते हैं। यही कारण है कि इसे दवा के रूप में अधिक उपयोग में लाया जाता है।

- तुलसी की एक जाति वन तुलसी भी होती है। इसमें जबरदस्त जहरनाशक प्रभाव पाया जाता है, लेकिन इसे घरों में बहुत कम लगाया जाता है। आंखों के रोग, कोढ़ और प्रसव में परेशानी जैसी समस्याओं में यह रामबाण दवा है।

- एक अन्य जाति मरूवक है, जो कम ही पाई जाती है। राजमार्तण्ड ग्रंथ के अनुसार किसी भी तरह का घाव हो जाने पर इसका रस बेहतरीन दवा की तरह काम करता है।

मच्छरों के काटने से होने वाली बीमारी - मच्छरों के काटने से होने वाली बीमारी, जैसे मलेरिया में तुलसी एक कारगर औषधि है। तुलसी और काली मिर्च का काढ़ा बनाकर पीने से मलेरिया जल्दी ठीक हो जाता है। जुकाम के कारण आने वाले बुखार में भी तुलसी के पत्तों के रस का सेवन करना चाहिए। इससे बुखार में आराम मिलता है। शरीर टूट रहा हो या जब लग रहा हो कि बुखार आने वाला है तो पुदीने का रस और तुलसी का रस बराबर मात्रा में मिलाकर थोड़ा गुड़ डालकर सेवन करें, आराम मिलेगा।

- साधारण खांसी में तुलसी के पत्तों और अडूसा के पत्तों को बराबर मात्रा में मिलाकर सेवन करने से बहुत जल्दी लाभ होता है।

- तुलसी व अदरक का रस बराबर मात्रा में मिलाकर लेने से खांसी में बहुत जल्दी आराम मिलता है।

- तुलसी के रस में मुलहटी व थोड़ा-सा शहद मिलाकर लेने से खांसी की परेशानी दूर हो जाती है।

- चार-पांच लौंग भूनकर तुलसी के पत्तों के रस में मिलाकर लेने से खांसी में तुरंत लाभ होता है।

- शिवलिंगी के बीजों को तुलसी और गुड़ के साथ पीसकर नि:संतान महिला को खिलाया जाए तो जल्द ही संतान सुख की प्राप्ति होती है।

- किडनी की पथरी में तुलसी की पत्तियों को उबालकर बनाया गया काढ़ा शहद के साथ नियमित 6 माह सेवन करने से पथरी मूत्र मार्ग से बाहर 
निकल जाती है। 

- फ्लू रोग में तुलसी के पत्तों का काढ़ा, सेंधा नमक मिलाकर पीने से लाभ होता है।

- तुलसी थकान मिटाने वाली एक औषधि है। बहुत थकान होने पर तुलसी की पत्तियों और मंजरी के सेवन से थकान दूर हो जाती है।

- प्रतिदिन 4- 5 बार तुलसी की 6-8 पत्तियों को चबाने से कुछ ही दिनों में माइग्रेन की समस्या में आराम मिलने लगता है।

- तुलसी के रस में थाइमोल तत्व पाया जाता है। इससे त्वचा के रोगों में लाभ होता है।

- तुलसी के पत्तों को त्वचा पर रगड़ दिया जाए तो त्वचा पर किसी भी तरह के संक्रमण में आराम मिलता है।

- तुलसी के पत्तों को तांबे के पानी से भरे बर्तन में डालें। कम से कम एक-सवा घंटे पत्तों को पानी में रखा रहने दें। यह पानी पीने से कई बीमारियां पास नहीं आतीं।

- दिल की बीमारी में यह अमृत है। यह खून में कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करती है। दिल की बीमारी से ग्रस्त लोगों को तुलसी के रस का सेवन नियमित रूप से करना चाहिए।

Thursday, 30 October 2014

तुलसी, अदरक और लौंग
















तुलसी, अदरक और लौंग

तुलसी, अदरक और लौंग ऐसे खाएंगे तो ये रोग परेशान नहीं करेंगे

छोटी-छोटी हेल्थ प्रॉब्लम्स होने पर भी तुरंत दवा खाना कुछ लोगों की आदत होती है। इसका मुख्यकारण घरेलू नुस्खों व उन्हें अपनाएं जाने के सही तरीके की जानकारी न होना है। ये हेल्थ प्रॉब्लम्स ऐसी होती हैं जिन्हें
बिना दवा खाए घरेलू नुस्खे अपनाकर भी ठीक किया जा सकता है। आज 

हम आपको बताने जा रहे हैं कुछ ऐसे ही घरेलू नुस्खे जो सिरदर्द, सर्दी-जुकाम, पेटदर्द जैसी छोटी प्रॉब्लम्स में रामबाण की तरह काम करते हैं....

- कच्चा लहसुन रोज सुबह खाली पेट खाने से कोलेस्ट्रॉल कम होता है। 

रोज 50 ग्राम कच्चा ग्वारपाठा खाली पेट खाने से कोलेस्ट्रॉल कम
हो जाता है।

-अदरक खाने से मुंह के हानिकारक बैक्टीरिया मर जाते हैं। साथ ही अदरक दांतों को भी स्वस्थ रखता है।अदरक का एक छोटा टुकड़ा छीले
बिना (छिलकेसहित) गर्म करके छिलका उतार दें। इसे मुंह में रख कर
आहिस्ता-आहिस्ता चबाते चूसते रहने से अन्दर जमा और रुका हुआ
बलगम निकल जाता है और सर्दी- खांसी ठीक हो जाती है।

- लौंग को पीसकर एक चम्मच शक्कर में थोड़ा- सा पानी मिलाकर उबाल लें व ठंडा कर लें। इसे पीने से उल्टी होना व जी मिचलाना बंद हो जाता है।

- 12 ग्राम गेहूं की राख इतने ही शहद में मिला कर चाटने से कमर और जोड़ों के दर्द में आराम होता है। गेहूं की रोटी एक ओर से सेंक लें और एक ओर से कच्ची रखें । कच्चे वाले भाग में तिल का तेल लगा कर दर्द वाले अंग पर बांध दें। इससे दर्द दूर हो जाएगा।

- हींग, सोंठ, गुड आदि पाचन में बेहद सहायक चीजों का सेवन करने से यह बीमारी जड़ से चली जाती है।

-थोड़ी सी हल्दी, धनिया, अदरक और काला नमक लेकर इस थोड़े से पानी में उबालें। इस गर्म पानी को पी जाएं। पेट से गैस छू-मंतर हो जाएगी।

-आदिवासियों के अनुसार अर्जुन की छाल का चूर्ण 3 से 6 ग्राम गुड़, शहद या दूध के साथ दिन में 2 या 3 बार लेने से दिल के मरीजों को काफी फायदा होता है।

-अर्जुन छाल और जंगली प्याज के कंदो का चूर्ण समान मात्रा में तैयार
कर प्रतिदिन आधा चम्मच दूध के साथ लेने से हृदय रोगों में हितकर
होता है।

-रोजाना तुलसी के पांच पत्ते खाने से मौसमी बुखार व जुकाम जैसी समस्याएं दूर रहती है।तुलसी की कुछ पत्तियों को चबाने से मुंह का संक्रमण दूर हो जाता है।मुंह के छाले दूर होते हैं व दांत भी स्वस्थ रहते हैं।

-तौलिए को गर्म पानी में भिगोकर उसे सिर पर थोड़ी देर रखने से सिरदर्द में तुरंत आराम मिलता है।

Tuesday, 24 June 2014

तुलसी
















१/ तुलसी प्रत्येक हिंदू घर के आँगन में लगाई जाती है और इसे एक पवित्र वृक्ष माना जाता है.

२/ तुलसी में लगने वाली मंजरियों में तुलसी के बीज लगते हैं. मंजरियों और तुलसीदल का उपयोग पूजा-पाठ में होता है.

३/ मरुवा भी तुलसी की ही भांति एक पौधा होता है, इसके गुण तुलसी की भांति होने के कारण इसे 'मरुवा-तुलसी' भी कहा जाता है.

४/ श्यामा (कृष्ण) तुलसी, सफेद (राम) तुलसी की तुलना में ज्यादा गुणकारी होती है.

५/ घर की हवा को शुद्ध रखने हेतु तुलसी के पौधे को गमलों में लगाना चाहिये. इन गमलों को नित्य, दिन में कमरों के अंदर व संध्या समय बाहर आँगन या बरामदे में (रातभर के लिये) रखना चाहिये. ऐसा करने से घर-परिवार में रोग-शोक नहीं होते हैं.

६/ तुलसी वायु, कफ, सूजन, कृमि एवं वमन का नाश करती है.

[B] आयुर्वेद में तुलसी से बनने वाली प्रमुख औषधियाँ एवं उनके उपयोग इस प्रकार हैं:

(a) लघुराजमृगांक व (b) तुलसी तेल.

(a) लघुराजमृगांक: तुलसी का रस, गाय का घी व कालीमिर्च को समभाग में मिलाने से यह औषधि तैयार हो जाती है.

(b) तुलसी तेल: 'तुलसी की पत्तियों का कल्क, भटकटैया की जड़, दंतमूल, बच, सहजन की छाल, कालीमिर्च और सैंधा नमक' इन सबको समभाग में लेकर उस मात्रा के कुल वजन से चार गुना तिल्ली का तेल और सोलह गुना पानी डालकर विधिवत सिद्ध करके तुलसी तेल का निर्माण किया जाता है.

१/ इन औषधियों की प्रकृति कफघ्न एवं उष्ण होती है.

२/ आयुर्वेद में तुलसी की पत्तियों का उपयोग श्लेष्म, खाँसी व पार्श्वशूल में बहुतायात रूप से किया जाता है. जमे हुये बलगम को तोड़ने के लिये तुलसी का उपयोग किया जाता है. बच्चों की खाँसी एवं बलगम का जमाव तथा प्रौढ़ की खाँसी, दमा, श्वास आदि में जो दवाएँ दी जाती हैं, उनमें सामान्यतया तुलसी की पत्तियों का प्रमुख रूप से प्रयोग किया जाता है.

३/ तुलसी उष्ण-वीर्य होती है, अतः जब भी शरीर में वायु-प्रकोप हो तुलसी का सेवन करना चाहिये. वातज्वर के उपचार में अन्य औषधियों के साथ साथ तुलसी मिलाई जाती है.

४/ तुलसी-सेवन से तन्द्रा दूर होती है, नशे का प्रभाव कम होता है व बड़बड़ानेवाले रोगी की बेहोशी दूर होकर वह होश में आ जाता है.

५/ तुलसी में दीप्ति का गुण होता है अतः उससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है.

६/ तुलसी से पेट की वायु, शूल और अफरा आदि दूर होते हैं.

७/ दाँतदर्द में कुचले हुये अदरक के टुकड़े को तुलसी की पत्तियों के मध्य रखकर इसे दर्द वाले दाँत के मध्य रखकर दबाने से पीड़ा दूर होती है. दंतशूल में दाँत की पोली जगह के अंदर इस संयोग को रखने से काफी लाभ होता है.

८/ कालीमिर्च के साथ तुलसी स्वरस का सेवन करने से मलेरिया में आराम मिलता है.

९/ लघुराजमृगांक नामक औषधि के सेवन से सभी प्रकार के वायुरोग नष्ट होते हैं व शरीर तेजस्वी बनता है.

१०/ नाक के रोग में यदि नाक से पपड़ी निकलती हो तो तुलसी की सूखी पत्तियों का चूर्ण रूमाल में रखकर सूँघने से पीनस का प्रभाव क्षीण पड़ जाता है. तुलसी-तेल की बूँदें नासिका में डालने से नासिका की सड़न दूर हो जाती है. इस हेतु २० ग्राम तुलसी स्वरस व २० ग्राम लघुराजमृगांक औषधि का संयोग अत्यंत लाभप्रद होता है.

[C] सुश्रूत आयुर्वेद:

१/ सुश्रुत के अनुसार सफेद मंजरीवाली तथा हरी पत्तियों वाली तुलसी कफ, वायु, विष, स्वास, खाँसी तथा दुर्गन्ध को नष्ट करने वाली है. यह पित्तकारक व पार्श्वशूल-मारक है.

२/ जंगली तुलसी भी ऐसे ही गुणों वाली व विष को नष्ट करने वाली होती है.

३/ काली मंजरी वाली तुलसी कफनाशक है.

[D] घरेलू उपचार: "रोगानुसार अनुपात" (तुलसी का अकेले उपयोग के स्थान पर अन्य संयोग के साथ रोगानुसार अनुपात में उपयोग करने पर ज्यादा लाभ मिलता है, अतः यथासंभव तुलसी का सेवन रोगानुसार अनुपात में ही करना चाहिये.)

१/ किसी भी प्रकार के ज्वर में तुलसी तथा बेल के पत्तों का काढ़ा, तुलसी, बेल व सौंठ का काढ़ा तथा तुलसी की पत्तियों का रस और शहद काफी लाभप्रद हैं.

२/ सन्निपात-ज्वर - तुलसी का रस व तुलसी, अदरक का मिश्र रस.

३/ कफ़ और दमा में - तुलसीरस + मिश्री.

४/ प्रमेह में - बंगभस्म व तुलसीपत्र.

५/ वायुप्रकोप में - प्रभालभस्म + तुलसीपत्र.

६/ रतौंधी - 'प्रबालभस्म + चूहे की लेंडी' पीसकर शहद के साथ मिलाकर आँखों में आँजें.

७/ 'तुलसी-काढ़ा' - लगभग १० ग्राम तुलसी की पत्तियों को ५० ग्राम पानी में उबालकर 'आधा याकि एक चौथाई' पानी शेष रहने पर उसे पीने से ज्वर, सुस्ती, अरुचि, दाह तथा वायु एवं पित्त का शमन होता है.

[E] भावप्रकाश: "तुलसी के विविध नामकरण"

१/ तुलसी - स्वयं की तुलना या उपमा को दूर करने के कारण 'तुलसी' कहलाती है.

२/ सुरसा - तुलसी उत्तम रस के कारण 'सुरसा' कहलाती है.

३/ ग्राम्या - गाँव अथवा विशेष निराली भूमि में होने की प्रकृति के कारण इसे 'ग्राम्या' कहा जाता है.

४/ सुलभा - सभी को सरलतापूर्वक आसानी से उपलब्ध हो जाने के कारण 'सुलभा' कहलाती है.

५/ बहुमंजरी - इसपर अनेक मंजरियों के लगने के कारण यह 'बहुमंजरी' कहलाती है.

६/ अपेतराक्षसी - इसके सानिध्य से राक्षसी पाप दूर भाग जाते हैं.

७/ श्वेत या गोरा तुलसी - सफेद रंग की तुलसी को 'गोरा तुलसी' कहा जाता है.

८/ कृष्ण-तुलसी - श्यामल रंग के कारण काली तुलसी को 'श्यामा या कृष्ण-तुलसी' कहा जाता है.

९/ शूलघ्नी - रोगों का नाश करने के कारण यह नामकरण हुआ.

१०/ देवदुन्दुभी - देवों के लिये आनंददायक होने से यह नाम पड़ा.

[F] गुणों के अनुसार तुलसी के नाम व किस्में:

[१) बर्बरी २) तुवरी ३) तुंगी ४) खरपुष्पा ५) अजगंधिका ६) पर्णास ७) कुठेरक ८) अर्जक ९) वटपत्र]

१/ बर्बरी - अनेकानेक अतिशय गुणों की खान होने के कारण इसे 'बर्बरी' कहा जाता है.

२/ तुवरी - इसका रस तुअर जैसा कसैला होने के कारण इसे 'तुवरी-बर्बरी-तुलसी' कहा जाता है.

३/ तुंगी - विष का नाश करने के कारण इसे 'तुंगी-बर्बरी-तुलसी' कहा जाता है.

४/ खरपुष्पा - कठोर एवं खुरदरे पुष्पों के कारण इसे 'खरपुष्पा-बर्बरी-तुलसी' कहा जाता है.

५/ अजगंधिका - इसकी गंध 'अज' अर्थात बकरे जैसी होने के कारण इसे 'अजगंधिका-बर्बरी-तुलसी' कहते हैं.

६/ पर्णास - यह संपूर्ण पत्तियों को गिराकर पत्तियों से दीप्ति प्रदान करती है अतः 'पर्णास-बर्बरी-तुलसी' कहलाती है.

७/ कुठेरक - श्यामल तुलसी कफ, वायु आदि का शमन करती है, अतः 'कुठेरक-श्यामा-बर्बरी-तुलसी' कहलाती है.

८/ अर्जक - स्वयं गोरवर्ण धारण करने व दूसरों को भी गोरापन प्रदान करने के कारण सफ़ेद तुलसी को 'अर्जक-बर्बरी-तुलसी' कहा जाता है.

९/ वटपत्र - इसकी पत्तियाँ वटवृक्ष के पत्तों के समान होने के कारण इसे 'वटपत्र-बर्बरी-तुलसी' कहा जाता है.

[G] तुलसी की महिमा के बहुआयामी परिदृश्य:

१/ 'अथर्ववेद' के अनुसार त्वचा, मांस तथा अस्थि में महारोग प्रविष्ट होने पर राम (श्वेत) तुलसी उसे नष्ट कर देती है. श्यामा तुलसी सौंदर्यवर्धक है. इसके सेवन से रोगिष्ठ त्वचा के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं और त्वचा पुनः मूल स्वरूप धारण कर लेती है.
तुलसी, त्वचा के लिये अदभुत गुणकारी है.

२/ 'भावमिश्र' के अनुसार तुलसी कटु, तिक्त (अर्थात तीखी), रसयुक्त, हृदय-हितकर, उष्ण, दाह-पित्त को उत्पन्न करने वाली और अग्निदीपक है. यह कुष्ठ, मूत्रकृच्छ्र, रक्तविकार,पार्श्वशूल, कफ तथा वात को नष्ट करने वाली है. श्वेत व कृष्ण दोनों तुलसी गुणों में करीब करीब समान हैं.

३/ 'चरक-सूत्र २७,१६९' के अनुसार तुलसी हिचकी, खाँसी, विषदोष, श्वास और पार्श्वशूल को नष्ट करती है. तुलसी पित्त को उत्पन्न करने वाली तथा वात, कफ एवं मुँह की दुर्गन्ध को नष्ट करती है.

४/ 'चरक-सूत्र २७-९९, १०३, १०४' के अनुसार कठिंजर (कृष्ण) तुलसी की पत्तियों कि सब्जी पचने में भारी, रुक्ष-प्रभावी तथा विष्टंभ करने वाली है. किन्तु यदि तुलसी की पत्तियों को पानी में उबालकर व रस निचोड़कर तथा प्रचुर मात्रा में देशीगाय का घी मिलाकर या उसमें तलकर सब्जी तैयार की जाये तो वह अत्यंत मधुर, पाकयुक्त, शीतवीर्य व मलबंधहर होती है.

५/ 'चरक-सूत्र २७-९६, ९८' के अनुसार बर्बरी तथा अर्जक (कुठेरक) तुलसी की सब्जी तिक्तरस, शीतवीर्य, कटुपाकी व कफपित्तहर होती है.

६/ 'निघंटु रत्नाकर' के अनुसार श्वेत व काली दोनों प्रकार की तुलसी कटुरसयुक्त, उष्ण व तीक्ष्ण हैं. ये दाह और पित्तकारक, हृदयहितकारी, तीखी, अग्निदीपक, वात, कफ, श्वास, खाँसी, हिचकी तथा कृमि को नष्ट करने वाली हैं. साथ ही सस्थ ये वमन, दुर्गन्ध, कुष्ठ, पार्श्वशूल, विषदोष, मूत्रकृच्छ्र, रक्तदोष, भूतबाधा, शूल, ज्वर व हिचकी नष्ट करती है.

७/ 'राजनिघंटु १०, १५८' के अनुसार तुलसी कटु, टिकट, रूचिवर्धक, कफ व पित्त का नाश करने वाली तथा शूक्ष्म कृमियों को मारने वाली होती है.

८/ 'धन्वंतरि निघंटु' के अनुसार तुलसी लघु, उष्ण, कफनाशक, कृमिनाशक है. यह जठराग्नि को प्रदीप्त कर रूचि को बढ़ाती है.

९/ 'राजवल्लभ' के अनुसार तुलसी रोगप्रतिकारक , शुष्कता, खाँसी, श्वास, अरुचि और पसली का दर्द आदि अनेकानेक रोगों पर विजय प्राप्त करने की क्षमता रखती है.

[H] पद्मपुराण के अनुसार :

१/ जब भगवान विष्णु ने अमृतमंथन किया था तब औषधियों और रसों में प्राणिमात्र के कल्याणार्थ सर्वप्रथम तुलसी की ही उत्पत्ति की थी.

२/ तुलसी की गंध हवा के साथ दूर-सुदूर जहाँ तक भी जाती है, वहाँ तक के वातावरण को व उस वातावरण में रहने वाले प्राणियों को वह पवित्र और निर्विकार बनाती है.

३/ जिस घर में तुलसी का पौधा होता है उस घर का वातावरण तीर्थस्थल के समान हो जाता है. वहाँ व्याधिरूपी यमराज प्रवेश नहीं कर पाते हैं.

४/ जिस घर में तुलसी का जल और मिट्टी मिट्टी मौजूद हों, वहाँ यम के गण ठहर नहीं पाते.
अर्थात जिन घरों में तुलसी के जल और मिट्टी का उपयोग किया जाता है वहाँ रोग के कीटाणुओं का उद्भव नहीं हो सकता.

५/ जिस घर या गाँव में तुलसी उगी हुई होती है, वहाँ तीनों लोकों के स्वामी 'भगवान विष्णु' निवास करते हैं तथा उस घर या गाँव में दरिद्रता, बंधुवियोग आदि कोई भी उपद्रव नहीं होते हैं.

तुलसी


















१/ तुलसी एक अमृतबूटी है. इसके प्रयोगों से चमत्कारिक सफलता प्राप्त होती है. विभिन्न प्रकार के विषों को दूर करने में इसका महत्वपूर्ण योगदान है.

२/ केवल सर्प, बिच्छु, पागलकुत्ता आदि के काटने से ही शरीर में विष नहीं फैलता वरन शरीर में उत्पन्न फोड़े, फुंसियाँ, खुजली, कैंसर, मलेरिया, कालेरा आदि रोगों के रूप में यह विष अनेकानेक प्रकार से शरीर में प्रकट होता है. रक्त में मिला हुआ विष रक्तकणों का नाश करता है व नाना प्रकार के रक्तविकार उत्पन्न करता है. तुलसी इन सभी प्रकार के विषों को नष्ट कर शरीर को निरोगी बनाती है.

३/ उचित विधिविधान के साथ तुलसी मिश्रित औषधियों का सेवन करने से चमत्कारिक लाभ मिलते हैं.

मित्रों, हम यहाँ कुछ ऐसे सत्य उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं, जिनसे तुलसी की अमोघता पर प्रकाश पड़ेगा और हम तुलसी को सही ढंग से पहचान सकेंगे.

१/ चाय, काफी, शक्कर अत्यंत हानिकारक होने के कारण महात्मागाँधी द्वारा स्थापित उरूलिकांचन (पुणे) के निसर्गोपचार आश्रम में इनके सेवन की मनाही होने से, तुलसी व अदरक को उबालकर काढ़ा तैयार किया जाता है. उसमें शहद अथवा गुड़ की शहद जैसी चासनी तथा उचित मात्रा में दूध डालकर रोगियों को दिया जाता है. यह वनस्पति-चाय पूर्णतः निरापद व अपेक्षाकृत अत्यंत लाभ पहुँचाने वाली होती है.

२/ तुलसी किडनी की कार्यशक्ति में वृद्धि करती है. उरूलिकांचन में तुलसी के रस में शहद मिलाकर देने से एक रोगी की किडनी की पथरी छः माह के निरंतर उपचार से बाहर निकल गयी थी.

३/ इंट्राट्रेकियल कैंसर से पीड़ित एक रोगी पर ऑपरेशन तथा अन्य अनेक उपचार करने के बाद, अंत में आशा छोड़कर डाक्टरों ने घोषित किया कि रोगी का यकृत खराब हो गया है तथा यक्ष्मा में भी वृद्धि हो रही है अतः अब यह लाइलाज रोग ठीक नहीं हो सकता. तभी एक वैद्द ने डॉक्टरों के उक्त विधान के विरुद्ध चुनौती दी. रोगी को पाँच सप्ताह तक सिर्फ तुलसी का सेवन करवाया. वह इतना स्वस्थ हो गया कि एक-सवा माह में ही वह एक-डेढ़ किलोमीटर पैदल चलने लग गया.

४/ योनि-कैंसर वाली एक वृद्धा को डॉक्टरों ने जब रेडियम व कोबाल्ट चिकत्सा द्वारा भी रोगमुक्त होते हुये न देखा और आशा छोड़ दी तब तुलसी के मात्र दस दिवसीय उपचार से ही उसका रक्तस्त्राव और दर्द कम हो गया तथा एक माह बाद तो उसके श्लेष्मायुक्त रिसते घाव भी ठीक हो गये.

५/ तुलसी के उपचार द्वारा हृदयरोग से पीड़ित कई रोगियों के उच्च-रक्तचाप सामान्य होकर हृदय की दुर्बलता कम हो गयी तथा रोगी के रक्त में चर्बी की वृद्धि भी रुक गई. जिन्हें थोड़ा भी चलने-फिरने व ऊपर चढ़ने की मनाही थी ऐसे अनेक रोगी तुलसी के नियमित सेवन के बाद आनंद से पहाड़ी स्थानों पर सैर व हवाखोरी के लिये जाने में समर्थ हुये.

६/ कलकत्ता की 'मॉडर्न-रिव्यू' नामक पत्रिका में सर्पदंश पर तुलसी के अद्भुत प्रभाव की एक घटना प्रकाशित हुई थी. एक व्यक्ति को साँप ने काट लिया था. वह सुदूर गाँव में रहता था. अतः आठ घंटे तक वहाँ कोई भी वैद्द या डॉक्टर नहीं पहुँच सका. आठ घंटे के बाद एक वैद्द पहुँचा. उसने तुलसी की पत्तियों को पीसकर स्वरस निकाला व इस स्वरस से बेहोश पड़े रोगी के सीने, चेहरे और कपाल की खूब मालिश की. साथ ही केले के तने का रस व तुलसी के पत्तों का रस दस-दस ग्राम की मात्रा में मिला-मिलाकर, थोड़े-थोड़े समय के अंतर से रोगी को पिलाता रहा. इस चिकित्सा के परिणामस्वरूप रोगी पूरी तरह स्वस्थ हो गया. यही प्रयोग रामकृष्ण मिशन आश्रम सहित अन्य स्थानों पर भी, इसी प्रकार सफल हुआ है.

७/ 'चिकित्सा-प्रकाश' नामक पत्रिका में एक बार प्रसिद्द चिकित्साशास्त्री श्री नलनीनाथ मजूमदार ने लिखा था कि देश की गुलामी के दौर में उनके एक मित्र के मकान में बिजली के तार डाले जाने वाले थे. अतः आवश्यक पूछताछ के लिये वे कलकत्ता के विद्युत विभाग के चीफ इंजीनियर के यहाँ गये. यह देखकर उन्हें अत्यंत आश्चर्य हुआ कि उस अंग्रेज अधिकारी के यहाँ तमाम गमलों में यत्र-तत्र तुलसी के अनेक पौधे लगे हुये थे. एक अंग्रेज के बँगले में सजावट के फूलों और लताओं के स्थान पर तुलसी-वाटिका देखकर उनसे रहा न गया और उन्होंने उस अंग्रेज अधिकारी से इसका कारण पूछा...!!! अधिकारी महोदय ने प्रत्युत्तर प्रश्न किया कि "तुमसे ज्यादा आश्चर्य तो तुम्हारी बात सुनकर मुझे हो रहा है कि तुम एक हिंदू होकर भी तुलसी का महत्व नहीं जानते? उन्होंने कहा कि हमारे यहाँ इंग्लैंड में 'तुलसी' पर विपुल साहित्य प्रकाशित हुआ है. क्या आपके हिस्दुस्तान में तुलसी पर कोई पुस्तक नहीं है? उन्होंने आगे कहा कि वास्तव में जितनी विद्दुतशक्ति तुलसी में है उतनी विश्व के अन्य किसी पौधे में नहीं है. जहाँ भी तुलसी-वाटिका होती है, उसके आसपास छः सौ फीट के क्षेत्र की हवा उससे प्रभावित होती है. परिणामस्वरूप मलेरिया, प्लेग तथा यक्ष्मा के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं. रोग के कीटाणुओं के आक्रमण से बचने के लिये मैं अपनी कमर में सदैव तुलसी के डंठल बाँधकर रखता हूँ तथा मैं नियमित रूप से सुबह-शाम तुलसी के बगीचे में टहलता रहता हूँ. इन्हीं कारणों से मैं सदैव स्वस्थ रहता हूँ."

८/ 'जीवनसखा' नामक पत्र के नवंबर १९४० के अंक में श्री विश्वनाथप्रताप द्वारा लिखित तुलसी के प्रभाव से संबंधित एक लेख प्रकाशित हुआ था. उनके ३५ वर्षीय मित्र बीमार पड़ गये. दिन-प्रतिदिन उनका स्वास्थ्य क्षीण होने लगा. अनेकानेक इलाज किये गये किन्तु रोग नहीं मिटा. अंत में उन्हें पटना के सरकारी अस्पताल में भर्ती किया गया. वहाँ डॉक्टरों ने बताया कि उनका कलेजा दुर्बल है. अस्पताल में मछली का तेल व अन्य मूल्यवान औषधियों का सेवन कराया गया किन्तु परिणाम शून्य रहा. चिकित्सकों ने उनके रोग को असाध्य घोषित कर दिया. घर के सभी लोग भी निराश हो गये. सभी ने मान लिया कि उनका अंत-समय आ गया है. हिंदू मान्यता के अनुसार अपने अंत-समय में उन्होंने गंगा मैया की गोद में ही शेष दिन बिताकर शरीर त्याग करने का निश्चय कर लिया. संयोगवश, सौभाग्य से एक महात्मा घूमते फिरते वहाँ आ पहुँचे. उन्होंने रोगी की पूरी स्थिति को अच्छी तरह जानने समझने के बाद रोगी से नित्य प्रातःकाल खाली पेट तुलसीपत्र एवं गंगाजल सेवन करने की सलाह दी. रोगी द्वारा तदनुसार पालन किया गया. सच मानें... जिस रोग को चिकित्सा-जगत ने असाध्य घोषित कर दिया था वही रोग एक माह के भीतर ही निर्मूल हो गया.

९/ एक वृद्ध व्यक्ति श्वास-रोग (Asthma), बृद्धआंत्रशोथ (Colitis) एवं श्वेतकोषवृद्धि (Leucocytosis) इन तीन गंभीर रोगों से पीड़ित था. रोगी की आँते भी खराब हो चुकी थीं. तुलसी के इलाज से उसके स्वास्थ्य में तीव्रगति से सुधार हुआ.

१०/ सात वर्ष की एक लड़की को दवाओं की एलर्जी थी. किसी भी दवा का सेवन करते ही उसके पूरे शरीर पर नीले रंग के चकत्ते उभर आते थे. जब उसे अनेक प्रकार के इलाजों से लाभ न मिल सका तब तुलसी के नियमित उपचार से उस रोगी की एलर्जी समूल नष्ट हो गई.

११/ एक प्रौढ़ व्यक्ति को जन्म से ही एलर्जी वाली सर्दी थी. तुलसी के सेवन से वह बिल्कुल स्वस्थ हो गया.

१२/ एक युवक को वर्षों से हर माह छः-सात दिनों के लिये ज्वर आ जाता था. उसने तीन माह तक लगातार तुलसी के काढ़े का प्रयोग किया, उसका ज्वर आना बिल्कुल बंद हो गया.

१३/ एक सज्जन को करीब पन्द्रह वर्षों से सिरदर्द रहता था. तुलसी के नियमित उपचार से उनका दर्द दूर हो गया.

१४/ एक लड़का बचपन से ही मंद्बुद्धि था. सोलह वर्षों तक उसके अनेक उपचार हुये किन्तु उसकी बौद्धिक मंदता दूर नहीं हुई. तुलसी के नियमित सेवन से दो ही महीनों के भीतर उसमें बुद्धिमत्ता के लक्षण दिखाई देने लगे. समय के साथ-साथ वह सामान्य व प्रखर बुद्धिशाली हो गया.

१५/ 'सायनस' की तकलीफ़ वाले एक युवक को डॉक्टरों ने ऑपरेशन की सलाह दी. वह इस हेतु तैयार भी हो गया था, किन्तु एक वैद्य की सलाह से उसने दो सप्ताह तक तुलसी का सेवन किया. उसके सर्दी-ज़ुकाम सब दूर हो गये और वह सर्ज़री से बच गया.

१६/ एक रोगी को किडनी की पथरी थी. चूँकि 'दही' रोगी की प्रकृति के अनुकूल नहीं था अतः उसे तुलसी, शहद के साथ दी गई.
छः माह के उपचार के बाद पथरी चूर-चूर होकर बाहर निकल गई.

१७/ सफेद दाग या कोढ़ के अनेक रोगियों को तुलसी के उपचार से अद्भुत लाभ हुआ है. उनके दाग कम हो गये और उनकी त्वचा सामान्य हो गई.

१८/ प्रोस्टेट-ग्रंथि के दर्द को दूर करने में भी तुलसी सहायक सिद्ध हुई है.

उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि तुलसी से असाध्य कैंसर तथा अनेक कष्टदायी व्याधियों से मुक्ति प्राप्त होती है.

ऐसे तो अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं जिनमें डॉक्टरों के असफल होने के बाद किये गये तुलसी के उपयोग से अनेक रोगी स्वस्थ्य हो गये. हम यहाँ कुछ अनुभूत प्रयोग प्रस्तुत कर रहे हैं. आप इन्हें SAVE करके अपने पास रखें और वक़्त-ज़रूरत, आवश्यकतानुसार आज़माते रहें.

१/ प्रातःकाल खाली पेट तुलसी की पत्तियों का रस पानी के साथ मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से बल, तेज और स्मरणशक्ति बढ़ती है. 

२/ तुलसी के काढ़े में थोड़ा सा गुड़ तथा गाय का दूध मिलाकर पीने से स्फूर्ति आती है और थकावट दूर होती है.

३/ नित्य तुलसी के रस का सेवन करने से जठराग्नि प्रदीप्त होती है.

४/ तुलसी के रस में नमक मिलाकर उसकी बूँदे नाक में डालने से मूर्छा दूर होती है व हिचकियाँ भी शांत होती हैं.

५/ तुलसी, ब्लडकोलेस्ट्राल को बहुत तेजी के साथ सामान्य बना देती है. तुलसी के सेवन से एसिडिटी दूर होती है. पेचिश, कोलाईटिस आदि मिट जाते हैं. स्नायुदर्द, सर्दी, जुकाम, सफ़ेद दाग, मंदबुद्धि, सिरदर्द आदि में यह गुणकारी है. बच्चों के कुछ रोगों में विशेषकर सर्दी, दस्त-उल्टी, और कफ़ में तुलसी अकसीर है.

६/ आहार-विहार का विशेष ध्यान न रखने से अनेक प्रकार की वात-व्याधियाँ हो जाती हैं, जिनमें 'गृघ्सीवात' (Sciatica) भी एक है. इस रोग में एक नाड़ी विशेष में पीड़ा होती है. कूल्हे की संधियाँ, कमर, पीठ, पेट, जाँघ तथा पैर में शूल चुभने की सी वेदना होती है.कूल्हे की शिराएँ एवं संधियाँ बार-बार काँपती हैं. इस रोग में दर्द प्रायः कमर से घुटने तक होता है व कभी-कभी टखने तक भी जाता है. तुलसी की पत्तियों को पानी में उबालकर दर्द वाले भाग पर उसकी भाप देने से इस रोग में लाभ होता है.

७/ तुलसी का नियमित सेवन करने वाले वृद्ध व्यक्ति दुर्बलता का अनुभव नहीं करते. वे शक्ति तथा उत्साह का अनुभव करते हैं व उनकी रोगनिरोधक शक्ति भी बढ़ती है.

८/ तुलसी-उपचार की पद्दति बिल्कुल सरल है. बच्चों के लिये पाँच से पच्चीस पत्तियाँ पर्याप्त हैं. वयस्कों के लिये उनके रोग, प्रकृति, क्षमता तथा ऋतु के अनुसार (शीतऋतु में अधिक व ग्रीष्मऋतु में कम) पच्चीस से एकसौ पत्तियाँ तक दी जाती हैं.

९/ पत्तियों को स्वच्छ पत्थर पर पीसकर उसके रस का उपयोग किया जाता है. रोगी की प्रकृति व स्थिति के अनुसार ५ से १० ग्राम तक रस पिलाया जा सकता है. तुलसी की मंजरियाँ भी एक ग्राम तक साथ में ली जा सकती हैं. मंजरियाँ पेशाब को साफ़ करती हैं और शक्ति बढ़ाती हैं. ताजी पत्तियाँ न मिलने पर सूखी पत्तियों के चूर्ण से भी काम चल सकता है.

१०/ तुलसी की दवा प्रातःकाल शौचादि से निवृत्त होकर कुछ भी खाने-पीने से पहले खाली पेट दिन में एक बार लेना ही ज्यादा कारगर सिद्ध होती है.

११/ प्रातःकाल खाली पेट तुलसी की पत्तियों का रस दो-तीन चम्मच लेने से बल, तेज और स्मरणशक्ति में वृद्धि होती है, लेकिन तकलीफ अधिक हो तो दिन में दो-तीन बार इसका सेवन किया जा सकता है.

१२/ जो लोग चाय और तंबाकू के व्यसनों से मुक्त होना चाहते हैं, उन्हें चाय तंबाकू के बदले तुलसी के काढ़े का उपयोग करना चाहिये. इसके अलावा तुलसी के साथ कालीमिर्च भी चबाएँ. इस प्रकार तुलसी के सेवन से शराब की लत से भी मुक्ति मिल जाती है.

१३/ तुलसी के उपयोग के साथ प्राणायाम, योगासन आदि भी किये जाएँ तो वे अधिक प्रभावशाली बन जाते हैं. तुलसी के इलाज़ के साथ प्राकृतिक चिकित्सा तथा होमियोपेथी भी प्रभावशाली रहती है. 

१४/ तुलसी का सेवन करते समय भगवान का नाम स्मरण करने से भी इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि तुलसी भगवान विष्णु को अति प्रिय है. 

१५/ तुलसी की पत्तियाँ, बीज तथा टहनियाँ औषधि का काम करती हैं. इसकी जड़ से ज्वर का प्रकोप शांत हो जाता है. इसके बीज वीर्य को गाढ़ा करते हैं. इसमें पाचन शक्ति बढ़ाने का अद्भुत गुण है.

१६/ वजन बढ़ाना हो या घटाना हो, तुलसी का सेवन करें. इससे शरीर स्वस्थ और सुडौल बनता है.